Monday, 10 October 2011

दाह


कितनी खुश थी मैं
उस छोटी सी चारदिवारी में 
जहाँ कई और भी थी मुझसी 
किसी की प्यास बुझाने को तैयार

याद आ रहा था मुझे बीता हुआ कल
जब उन सुर्ख होठों को छुआ था मैंने
जो मुझसे भी ज्यादा बेताब हुआ करते थे
मुझे छुने  के लिए

उफ्फ! वो मोहब्बत वो ज़माना याद आता था 
जब प्यार परवान चढ़ा करता था 
मैं उसके लिए और वो 
मेरे लिए जिया करता था

याद आ रही थी मेरे बदन पर नाचती उसकी उँगलियाँ
उसका बहुत प्यार से जज्ब करना मेरी खुशबु 
और सुलगा देना मेरा सीना अपनी फूँक से

कितनी खुश थी मैं.....
ये सब याद आने तक !

फिर याद आई वो रात
जब उसने मुझे आजमाया था
मुझसे गुजर कर जब वो निकला था आगे
और लिपट गई थी मैं उसके तलवों से 
उसी चुम्बन की उम्मीद में... 

इस बात का तमाशा उसने कुछ ऐसे बनाया था
छोड़ के मुझे अधजला किसी गैर को अपनाया था
उस रात कि घुटन में मैंने आखरी सांसें ली थी
और खुद को यही समझाया था

कि शायद तुम कभी नहीं समझोगे 
एक प्यास बुझाने को सिगरेट कितना जलती है!


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