Friday, 14 October 2011

दीवार

दिन भर के काम से थक कर 
जब चूर हो जाती हूँ 
और दिमाग की सुईं 
अटक जाती है किसी बात पर 
तब मैं भी हार मान लेती हूँ 
और ताकने लगती हूँ अपने अन्दर 

पता चलता है की मैंने 
बड़ी महनत से कड़ी कर दी है
अपने भीतर एक दीवार
जो खुद से अलग कर रही है मुझे
उस दीवार के उस पार
एक अलग मैं हूँ
सब जिम्मेदारियों से दूर
उन्मुक्त, चंचल, नटखट
पर उस 'मैं' को घेरे है एक और 'मैं'
जिसने सीख लिया है बोझ उठाना
और खुद को परिस्तिथि के अनुसार
ढाले चल रही है
जिसे
वक़्त ने सिखा दिया है रंग बदलना
'मैं' घिर गई हूँ 
'मैं' बँट गई हूँ  
'मैं' बाहर भी हूँ, भीतर भी
'मैं' सूक्ष्म भी हूँ, साक्ष्य भी
'मैं' वजह भी हूँ, बेवजह भी
ये दीवार ईंट दर ईंट बढ़ रही है
मैं डर रही हूँ
जब ढांचा तैयार होगा तब क्या?
क्या मैं हमेशा के लिए कैद हो जाऊँगी?
या शायद आज़ाद हो जाऊँगी अपने आप से?
सवाल बहुत हैं
पर सुईं अटक गई है
और ये दीवार
दीवार ईंट दर ईंट बढ़ रही है

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